गुरुवार, 25 अगस्त 2016

!! तीनों लोकों के पालनहार, बन गए आज मैया के लाल!!


तीनों लोकों  के पालनहार
जिनकी इच्छा से चले काल
परमपुरुष, परमात्मा,  स्वराट
बन गए आज मैया  के लाल.

श्यामल वर्ण, कमल नयन
रक्तिम अधर सुंदर सुकुमार.
घुंघराले काले बादल से केश
छोटा-सा नन्हा-सा तारणहार.

जब भी प्रकट होते प्रभु तब
सारी सृष्टि मनाती है उत्सव.
उनके प्राकट्य दिवस से बढ़कर
कहाँ कहीं कोई और महोत्सव.

मनाये महोत्सव करे प्रार्थना
हृदय हमारा उनका हो जाए.
मन, वाणी, बुद्धि ,प्राण तक में
बस साँवली सूरत ही छा जाए.

!! जैसे नंदमहल में पधारे हो मोहन पधारो हमारे भी मन के महल में !!


भाद्र मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी
रोहिणी नक्षत्र और मध्य रात्रि
जब काली अँधियारी रात में
फैला था जैसे बनके  उजाला ।

भर गया वो रोशनी कारागृह में
भावनाओं में, आकांक्षाओं में
कर गया प्रदीप्त पूरे भुवन को
देवकी का जना लाल वो काला।

खुल गयी बेड़ियाँ,खुल गये द्वार
खुल गए जगत के सारे बंधन
आने की आहट सुनते ही जिनकी
निद्रा में सो गया पाप का रखवाला।

बरस-बरसकर  करे मेघ  अभिषेक
यमुना चरणों को बार-बार पखारे
यमुना को पारकर,गोकुल पधार कर
देवकीसुत अब बन गये हैं नंदलाला।

नंदमहल में उल्लास-ही-उल्लास है
हर ओर माखन-मिस्री सी मिठास है
कोई नही कहता कि हुआ है लाला
नंद के आनंद भयो कहे ब्रिजवाला।

जैसे नंदमहल में पधारे हो मोहन
पधारो हमारे भी मन के महल में।
दुनिया के साज औ राग बहुत हुए
अब तो मुरली सुना दे मुरलीवाला।

सोमवार, 13 जून 2016

!! हो शांति, संतुष्टि और चैन भरा प्रस्थान !!


जीवन में जो हैं
घड़ियाँ मिली.
बीती जा रही है
घड़ी दर  घड़ी.

अभी भी सुधि नही
है सुधरने की.
अभी भी ख्वाहिशें
जस-की-तस हैं पड़ी.

रोज ही
ढलता सूरज
चुरा ले कुछ
जीवन मुझसे.

घटते जा रहे हैं
मेरे दिन
बिना बताये
बिना ही पूछे.

ये बहती हवा
देती हैं साँसें
पर हर साँस की
होती है गिनती.

एक भी साँस
ज्यादा न मिले
कितनी भी कर ले
हम चाहे विनती.

जीवन के दीये में
तेल है जितना.
उतनी ही देर तो
ये जल पायेगा.

किसी दिन
फफककर
दिल खोलके जलकर
ये बुझ जाएगा.

उस दिन फिर
कौन संग जाए?
कौन करे कम पीड़ा
कौन हरे दुःख हमारा?

ये जमा कमाया
शोहरत-दौलत.
दूर के रिश्ते या
पास का बेटा दुलारा?

जाने की पीड़ा
होगी मन में
या कुछ देकर
जाने का संतोष?

जीवन को
करेंगे शुक्रिया
या लगाते रहेंगे
तब भी दोष?

आज जरा मैं
सोचूँ उसपे.
मेरा अपना अस्तित्व
टिका है जिसपे.

हो शांति
संतुष्टि
और चैन
भरा प्रस्थान.

कोई ग्लानि,
कोई गलती
न बने
मार्ग का व्यवधान.

शुक्रवार, 20 मई 2016

!! हमारी भक्ति की भी करें आप रक्षा, हम भी कर रहे हैं कब से प्रतीक्षा !!


भक्त प्रह्लाद के विश्वास खातिर 
प्रकट हुए जब खम्भे से भगवान्.
विकराल रूप औ सिंह सी गर्जना 
बढ़ा गये भक्त की भक्ति का मान.

हिरण्यकश्यपु वध न था प्रयोजन 
प्रह्लाद का प्रेम उन्हें बुला लाया.
पहली बार प्रभु ने  पिता रूप में
वात्सल्य इस अवतार में दिखाया.

भक्तों के प्रेमवश पुत्र बनकर तो 
कई बार पाया था वात्सल्य अपार.
पर आये थे बनकर पिता आज  
लुटाने पुत्र पर स्नेह अबाध इसबार.

दुष्ट वध के बाद अद्भूत रूप देख 
डरे जब लक्ष्मी तक पास आने में.
तब आया वो नन्हा भक्त निकट  
भूल क्रोध लगे प्रभु प्रेम लुटाने में.

हे करुणाकर,    हे लक्ष्मीपति 
हे नरहरि,    हे नृसिंह अवतार.
कब होगी हम पर भी कृपा तेरी 
कब पायेंगे हम भी तेरा वो प्यार.

हम सब प्रहलाद से तो भक्त नही 
पर आप तो सबके लिए ही नरहरि.
हमारी भक्ति की भी करें आप रक्षा 
हम भी कर रहे हैं कब से प्रतीक्षा.

हिरण्यकश्यपु हम स्वयं अपने 
उस दुष्ट का आप कर दो संहार.
चरणों में आपके,हो निश्छल श्रद्धा 
दूर हो भक्ति पथ के  सारे विकार.

करबद्ध होकर विनीत ह्रदय 
अश्रुपूरित नयनों से करूँ नमन.
हे भक्ति औ भक्त दोनों के रक्षक 
दे दें हमें भीअपनी कृपा का धन.

हमें भी जरा लगा लो अपने गले से 
बना अपना वत्स हे भक्तवत्सल प्रभु
कलि का समय औ कमजोर साधना 
यूं ही अपना लो न हे सर्वसमर्थ प्रभु.