सोमवार, 13 जून 2016

!! हो शांति, संतुष्टि और चैन भरा प्रस्थान !!


जीवन में जो हैं
घड़ियाँ मिली.
बीती जा रही है
घड़ी दर  घड़ी.

अभी भी सुधि नही
है सुधरने की.
अभी भी ख्वाहिशें
जस-की-तस हैं पड़ी.

रोज ही
ढलता सूरज
चुरा ले कुछ
जीवन मुझसे.

घटते जा रहे हैं
मेरे दिन
बिना बताये
बिना ही पूछे.

ये बहती हवा
देती हैं साँसें
पर हर साँस की
होती है गिनती.

एक भी साँस
ज्यादा न मिले
कितनी भी कर ले
हम चाहे विनती.

जीवन के दीये में
तेल है जितना.
उतनी ही देर तो
ये जल पायेगा.

किसी दिन
फफककर
दिल खोलके जलकर
ये बुझ जाएगा.

उस दिन फिर
कौन संग जाए?
कौन करे कम पीड़ा
कौन हरे दुःख हमारा?

ये जमा कमाया
शोहरत-दौलत.
दूर के रिश्ते या
पास का बेटा दुलारा?

जाने की पीड़ा
होगी मन में
या कुछ देकर
जाने का संतोष?

जीवन को
करेंगे शुक्रिया
या लगाते रहेंगे
तब भी दोष?

आज जरा मैं
सोचूँ उसपे.
मेरा अपना अस्तित्व
टिका है जिसपे.

हो शांति
संतुष्टि
और चैन
भरा प्रस्थान.

कोई ग्लानि,
कोई गलती
न बने
मार्ग का व्यवधान.

शुक्रवार, 20 मई 2016

!! हमारी भक्ति की भी करें आप रक्षा, हम भी कर रहे हैं कब से प्रतीक्षा !!


भक्त प्रह्लाद के विश्वास खातिर 
प्रकट हुए जब खम्भे से भगवान्.
विकराल रूप औ सिंह सी गर्जना 
बढ़ा गये भक्त की भक्ति का मान.

हिरण्यकश्यपु वध न था प्रयोजन 
प्रह्लाद का प्रेम उन्हें बुला लाया.
पहली बार प्रभु ने  पिता रूप में
वात्सल्य इस अवतार में दिखाया.

भक्तों के प्रेमवश पुत्र बनकर तो 
कई बार पाया था वात्सल्य अपार.
पर आये थे बनकर पिता आज  
लुटाने पुत्र पर स्नेह अबाध इसबार.

दुष्ट वध के बाद अद्भूत रूप देख 
डरे जब लक्ष्मी तक पास आने में.
तब आया वो नन्हा भक्त निकट  
भूल क्रोध लगे प्रभु प्रेम लुटाने में.

हे करुणाकर,    हे लक्ष्मीपति 
हे नरहरि,    हे नृसिंह अवतार.
कब होगी हम पर भी कृपा तेरी 
कब पायेंगे हम भी तेरा वो प्यार.

हम सब प्रहलाद से तो भक्त नही 
पर आप तो सबके लिए ही नरहरि.
हमारी भक्ति की भी करें आप रक्षा 
हम भी कर रहे हैं कब से प्रतीक्षा.

हिरण्यकश्यपु हम स्वयं अपने 
उस दुष्ट का आप कर दो संहार.
चरणों में आपके,हो निश्छल श्रद्धा 
दूर हो भक्ति पथ के  सारे विकार.

करबद्ध होकर विनीत ह्रदय 
अश्रुपूरित नयनों से करूँ नमन.
हे भक्ति औ भक्त दोनों के रक्षक 
दे दें हमें भीअपनी कृपा का धन.

हमें भी जरा लगा लो अपने गले से 
बना अपना वत्स हे भक्तवत्सल प्रभु
कलि का समय औ कमजोर साधना 
यूं ही अपना लो न हे सर्वसमर्थ प्रभु.

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

!! ये मन, ये जन मुझे तुझसे दूर कर देने पर आमादा है !!


हे मेरे कन्हैया
जरा तुझसे कुछ बातें मै कर लूँ
मन कुछ उलझने
जरा तेरे सामने मै कह लूँ.

क्यों भूल जाती
कि तेरे बिना मै कुछ भी नही.
तुझसे अलग
हो सकता है सच कुछ भी नही.


फिर भी क्यों भागे मन
यहाँ-वहाँ.
तुझसे दूर जाने ये भटके
कहाँ-कहाँ.

दुनिया में ढूँढे सुख
जबकि तूने उसे यहाँ रखा ही नही.
साथी ढूँढे यहाँ
जबकि तेरे सिवा कोई साथ देता नही.

ढूँढे एक ठिकाना
जहाँ चैन रहना चाहे ये मन.
रस्ते में ही रूककर
मंजिल बनाना चाहे ये मन.

तेरी आवाज भी नही आती
ख्वाहिसों का शोर इतना ज्यादा है.
ये मन, ये जन मुझे
तुझसे दूर कर देने पर आमादा है.

अब मेरे से कुछ भी नही संभव
संभाल लो न मेरा सब.
इतने दलदल में तो फँस चुकी
अब नही तो संभालोगे फिर कब.


उलाहना नही है ये
एक प्रार्थना है खुद को बचाने के लिए.
एक संदेश है तुझे
अपने तक जल्दी बुलाने के लिए.

गुरुवार, 31 मार्च 2016

!! न हाथ में हैं जनम, न हाथ में मरण, पर हाथ में हमारे ये बीच का जीवन !!


न हाथ में हैं जनम, न हाथ में मरण
पर हाथ में हमारे ये बीच का जीवन.
जीवन का हर क्षण प्रभु को समर्पित
फिर चाहे जब उजड़ जाए ये चमन.


जितनी भी जिन्दगी वो वरदान है
पता नही फिर कब ऐसी मिलेगी.
होठों पे हरिनाम औ भक्तों का संग
नियति ये अवसर दुबारा कब देगी.

इस अवसर को न गंवा दे हम यूं ही
खोने- पाने का हिसाब लगाते लगाते.
करोड़ों -करोड़ों जन्म बीत जाते हैं
फिर से ऐसा मानव जन्म पाते-पाते.