रविवार, 17 जून 2012

जी ले उसके लिए हर पल जीना फिर हो जाएगा सफल

जैसे मुट्ठी से रेत
देखते-देखते फिसल जाती है
ऐसे ही जिंदगी हमारी
देखते-देखते गुजर जाती है

जिस लम्हा में वो
वो लम्हा जिया
वरना हमने
जाने क्या किया?

जहां गई ये आँखें
वहाँ थी क्या
उसकी श्यामली सूरत

नही तो फिर न थी
देखने न ही
इन आँखों की जरूरत.

उसके सिवा
किसके लिए
इस जीवन में कुछ करे

अगर न करे
उसके लिए
सोने की थैली में कंकड़ भरे

पता नही कौन-सा
आखिरी पल
कौन जाने आएगा
कि नही अपना कल

जी ले उसके लिए हर पल
जीना फिर हो जाएगा सफल.

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच बात है..

kunwarji's ने कहा…

जय श्री कृष्ण...

कुँवर जी,

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!