सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

खुद ही तुझसे छुडाया था एकदिन, आज कहती थाम लो मेरा हाथ.



कर लूँ आज मन की बातें
अपने चिर प्रियतम से .
छुपा रखा जिसे अपने अंदर
मैंने जाने कब से.

वहाँ वो मेरा राह देख रहा
और मै भी यहाँ भटक रही.
मौका भी है,मोहलत भी है
कह दूं जो अब तक न कही.

जब से मैंने तुझको छोड़ा
सुख ही मुझसे छूट गए.
जिनके लिए तुझसे रूठी
वो सपने भी मुझसे रूठ गए.

मेरी सबसे बड़ी भूल थी
घर वो अपना छोड़ के जाना.
सदियों से घर बदल-बदल थकी
अब मुझे वापस घर है आना.

तुझने दी मुझे सदा आजादी
मर्जी मेरी कि मै कही भी जाऊं.
जानूं मै तू बुलाना चाहे, फिर भी
पूछ रही तुझसे -क्या मै आ जाऊं.

तेरे सिवा कोई प्रेमी है ही नही,
कान्हा,कोई न जाने प्रेम की बात.
खुद ही तुझसे छुडाया था एकदिन
आज कहती थाम लो मेरा हाथ.


5 comments:

वन्दना ने कहा…

सच कह दिया सभी की यही दशा है।

सदा ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

शिवकुमार ( शिवा) ने कहा…

बहुत सुंदर रचना .

amrendra "amar" ने कहा…

sunder abhivyakti ke saath sunder prem, ..

amrendra "amar" ने कहा…

ise hi to kehte hai saccha prem .radhe radhe*****