मंगलवार, 19 मई 2009

शरण में ले लो कान्हा

अब तो शरण में ले लो कान्हा
इस जग में और कितना पीसूँ
तड़प रही है आत्मा मेरी और
उसे कहाँ -कहाँ कितना घसीटूं

जितना ही तेरी और बढूँ मै
दुनिया उतनी ही मुझको खींचे
कदम बढाऊँ तेरी ओर तो
रिश्ते- नाते आये पैरों के नीचे

रिश्तों को कुचलने का कलंक
भी अपने दामन पे लगाकर
बदती हूँ तो दिल कचोटता
धोउंगी कहाँ ये कलंक जाकर

भक्ति का विरवा अभी सह
नही पाता संसार के झंझावात
हर तरफ से होता इस पे ही
भौतिकता का पहला आघात

कुछ बूंदों से इसे सींच पाती
और माया भयानक धूप बरसाती
बड़ा मुश्किल होता इसे बचाना
संसारिकता की जब आँधी आती

इन दुविधाओं से अब तार दे
हर बंधन से अब उबार दे
बंधू तो बस तेरे चरणों से ही
दे तो बस भक्ति का संसार दे


रह गयी दुनिया की कोई चाह न
दिखे भक्ति के अलावा कोई राह न
नयी - नयी पथिक हूँ इस राह की
देखना बस कर दे कोई गुमराह न

2 comments:

Kshitij ने कहा…

अत्यंत ही भावः पूर्ण रचना है ! हर शब्द ,हर पंक्ति आपके कृष्ण के प्रति भावों को बहुत ही सुन्दर तरीके से प्रस्तुत कर रहे हैं !
कृष्णा तक पहुँचने की लालसा और भक्ति की इतनी हर्दय पूर्ण आस्था को आपने बहुत सुन्दरता से लिखा है

कृष्ण अपने भक्त को कभी भी गुमराह या कलंकित नहीं होने देते हैं !
वो अपने भक्त की हमेशा रक्षा करते हैं ,फिर वो भोतिकता का आघात हो या रिश्तों को कुचलने का कलंक .
वैसे कृष्ण की ये लीला है की वो अपने भक्त को इस भोतिकता के तराजू में भी कभी अकेला या शक्ति विहीन नहीं होने देते हैं !

भक्ति के मार्ग पे मुश्किलें तो हैं ,रास्ता पथरीला और दुःख से भरा है ,पर सिर्फ और सिर्फ शुरूवात में ,आगे तो प्रभु आपको संभाल लेते हैं ,लेकिन ऐसा नहीं है वो आपका साथ नहीं देते ,वो तो आपकी इस सोच से ही की आप उनकी शरण में आना चाहतें हैं ,आपके साथ आ जाते हैं !

भक्त को सिर्फ और सिर्फ उनपे आस्था और सब्र रखना चाहिए !

जो बी भक्ति की रह पे एक बार चला है ,उसे प्रभु ने लौटने नहीं दिया है अगर उसमे सच्ची आस्था और प्रभु तक पहुँचने की लगन है !

कृष्णा आपको शीघ्र अपनी शरण में ले ,ऐसी मेरी प्राथना है प्रभु से !
शुभकामनाएं

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

anmol rachna..

bhakti poorn ...bhavpoorn .. krishna mere arradhya hai..

itni acchi rachna ke liye badhai ..............

meri nayi poem padhiyenga ...
http://poemsofvijay.blogspot.com

Regards,

Vijay