शुक्रवार, 20 मई 2016

!! हमारी भक्ति की भी करें आप रक्षा, हम भी कर रहे हैं कब से प्रतीक्षा !!


भक्त प्रह्लाद के विश्वास खातिर 
प्रकट हुए जब खम्भे से भगवान्.
विकराल रूप औ सिंह सी गर्जना 
बढ़ा गये भक्त की भक्ति का मान.

हिरण्यकश्यपु वध न था प्रयोजन 
प्रह्लाद का प्रेम उन्हें बुला लाया.
पहली बार प्रभु ने  पिता रूप में
वात्सल्य इस अवतार में दिखाया.

भक्तों के प्रेमवश पुत्र बनकर तो 
कई बार पाया था वात्सल्य अपार.
पर आये थे बनकर पिता आज  
लुटाने पुत्र पर स्नेह अबाध इसबार.

दुष्ट वध के बाद अद्भूत रूप देख 
डरे जब लक्ष्मी तक पास आने में.
तब आया वो नन्हा भक्त निकट  
भूल क्रोध लगे प्रभु प्रेम लुटाने में.

हे करुणाकर,    हे लक्ष्मीपति 
हे नरहरि,    हे नृसिंह अवतार.
कब होगी हम पर भी कृपा तेरी 
कब पायेंगे हम भी तेरा वो प्यार.

हम सब प्रहलाद से तो भक्त नही 
पर आप तो सबके लिए ही नरहरि.
हमारी भक्ति की भी करें आप रक्षा 
हम भी कर रहे हैं कब से प्रतीक्षा.

हिरण्यकश्यपु हम स्वयं अपने 
उस दुष्ट का आप कर दो संहार.
चरणों में आपके,हो निश्छल श्रद्धा 
दूर हो भक्ति पथ के  सारे विकार.

करबद्ध होकर विनीत ह्रदय 
अश्रुपूरित नयनों से करूँ नमन.
हे भक्ति औ भक्त दोनों के रक्षक 
दे दें हमें भीअपनी कृपा का धन.

हमें भी जरा लगा लो अपने गले से 
बना अपना वत्स हे भक्तवत्सल प्रभु
कलि का समय औ कमजोर साधना 
यूं ही अपना लो न हे सर्वसमर्थ प्रभु.

1 comments:

मनीष प्रताप ने कहा…

भक्ति से सराबोर रचना ने भावुक कर दिया। बहुत अच्छी लगी आपकी रचना मुझे.....