बुधवार, 28 अक्तूबर 2015

!! विरह में अपने किसी को मारना,ये भी तो एक वध ही है कान्हा !!


"शरदुदाशये साधुजातस-
त्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा ।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका
वरद निघ्नतो नेह किं वधः ॥ २॥"

शरद के चंद्र से धुला जलाशय
उसमें एक सुन्दरतम कमल.
अद्भूत छवि और छटा उसकी
धवल चांदनी और सुमन विमल.

पर उस कमल की सुन्दरता भी
फीका सांवरी चितवन के आगे.
ऐसी मोहिनी है इस चितवन में
कि व्रजवधुओं ने घरबार त्यागे.


हम तो हैं बिन मोल की दासी
बस आपके दर्शन की प्यासी.
सारे जग के जीवन दाता आप
फिर हमसे भला ये कैसी उदासी.


दर्शन बिना क्या दशा हमारी
बस बचा है इन प्राणों का जाना.
विरह में अपने किसी को मारना
ये भी तो एक वध ही है कान्हा..