मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

ऐसा नही हो सकता कान्हा कि तू बिना बुलाये ही आ जाए.

कान्हा कहते कि तू भक्ति से मिलता
पर मै भक्ति कैसे करूँ.
शुरुआत इसकी मन से होती पर
गंदे मन में कैसे धरूं.

ह्रदय में इतनी पाप की परते पडी
हटाना मेरे वश में नही.
कर्म भी मैंने ऐसे किये कि
तेरे मिलने की कोई आश ही नही.

बस तेरी बनके भी न रही मै
जाने कितने रिश्तों को है ढोया.
एक बार न छलका तेरे लिए कभी
वो औरों के लिए कितनी बार रोया.

काबिल नही तेरे दर्शन की पर
दिल कहता कि एकबार तू आये.
न ह्रदय में प्रेम, न मन में पुकार
फिर किस तरह कैसे तुझे बुलाये.

ऐसा नही हो सकता कान्हा कि
तू बिना बुलाये ही आ जाए.



2 comments:

वन्दना ने कहा…

्सम्पूर्ण समर्पण कर दो तो बिना बुलाये भी आ जाता है।

G.N.SHAW ने कहा…

birah bedana bhari bhaook kaveeta. sundar aur marmik.