मंगलवार, 18 जनवरी 2011

चलो राधिका आज यमुना के तीर,कदम्ब तले बैठ मैं वंशी बजाऊं.



चलो राधिका आज यमुना के तीर
कदम्ब तले बैठ मैं वंशी बजाऊं.
आ जाती गोपियाँ सुनते ही वंशी
आज वंशी की धुन बस तुझे ही सुनाऊं.

बोले हैं लोग बोलियां अनेक
न जाऊं कान्हा साथ मै तेरे
ये सहेलियां मेरी लेके तेरा नाम
रात-दिन मुझको वैसे ही छेड़े

यूँ न घबरा , न तू शरमा
जा रहा है कान्हा तुझे साथ लेके .
तू अगल कहाँ है मुझसे राधे
नजरे हैं जिनकी वो हमें एक ही देखे .

कान्हा जितना ही तू प्यारा है
उससे भी प्यारी तेरी बातें होती.
ले चल कान्हा मुझे तू वहाँ, जहाँ
सूरज की किरणों को यमुना धोती.

5 comments:

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (20/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

रश्मि प्रभा... ने कहा…

waah ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना ...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

jay ho radha-krishn ke amar prem ki .
kavita to yaheen aakar poorn hoti hai !

Dr. shyam gupta ने कहा…

वाह!!!!!!!!!!!!

---श्याम, श्याम-श्यामा लीला लखि, श्याम ह्वै गये श्याम....