बुधवार, 22 सितंबर 2010

कान्हा तुझे मै छोड़ नही सकती

जाने क्यों संसार के इन बंधनों में

आत्मा को घुटन-सी होती है.
भौतिक बातें तो दिलोदिमाग
को जल्दी-ही थका जाती हैं

ये माया हमारी भक्ति को
परख रही है .
या प्रभु के प्रेम से
विरक्ति उपज रही है.

दुविधा खड़ी हो जाती है
हर एक कदम उठाने पर.
कही ये प्रभु से दूर न ले जाए
कुछ भी न बचे आने तक.

जो भी हो संभालना मुश्किल है
दोनों को साथ ले चलना मुश्किल है.
दोनों को कैसे मै दिल से लगाऊं
मेरे पास एक -ही तो दिल है.

कान्हा तुझे मै छोड़ नही सकती
और दूसरे को भी साथ ले चलना है.
मेरे वश में कुछ भी न रहा अब
अब जो भी है तुझे ही करना है.

4 comments:

वीना ने कहा…

सच कहा जो करना है तुझे ही करना है
अतिसुदंर
http://veenakesur.blogspot.com/

वीना ने कहा…

सच कहा जो करना है तुझे ही करना है
अतिसुदंर
http://veenakesur.blogspot.com/

वन्दना ने कहा…

बस जब उसपे छोड दिया तो अपने आप संभाल लेगा।

अरुणेश मिश्र ने कहा…

अगाध भक्ति ।