मंगलवार, 15 मई 2012

समझ से परे है आप प्रभु और आपकी भक्तवत्सलता


हाथ और घुटनों के सहारे
चलने लगे है लालन हमारे
सखीं संग बैठ मैया निहारे
छोडकर घर के  कारज सारे

कभी मिट्टी में डोले
कभी कीचड में खेले
कभी पायल की छमछम
कभी कीचड का छपछप

कभी पूँछ पकड़ बछड़े की
भागे बछड़ा इनको लटकाए
दौडी मैया,गिरे न लल्ला
कही इसे चोट न लग जाए

धूल के बीच नीलमणि-सा
दमक रहा था सुकुमार बदन
लगाया झपटकर सीने से अपने
और मैया करने लगी रूदन

कैसा ये प्रेम यशोदा का कि
जगतपति दिखाए चपलता
समझ से परे है आप प्रभु
और आपकी भक्तवत्सलता

3 comments:

kunwarji's ने कहा…

जी सही कहा.... समझ से परे है....

कुँवर जी,

Ravi kant yadav justiceleague ने कहा…

कृपया मेरी रचना भी देखे

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अचिन्त्य सम्बन्ध है, भगवान और भक्त का।