सोमवार, 31 जनवरी 2011

क्यूं भेजा मुझे मथुरा मैया, कोई कहे न मोहे कन्हैया.

क्यूं भेजा मुझे मथुरा मैया
कोई कहे न मोहे कन्हैया.
ये ठाट-बाट भाये न मुझको
लौटा दे मेरी लटुकी और गैया .

न यहाँ यमुना, न यहाँ मधुवन
न ही व्रजवालों-सा चितवन.
सब कहे हैं ईश्वर मुझको
कोई सुने न मेरा क्रंदन.

सुबह कलेवा,दिन का भोजन
व्रज का वो मिस्री और माखन.
जब मथुरा सारी करे शयन
तब याद कर भीगे मेरे नयन .

मुरली बजाना भूल ही गया
राग तो सारे व्रज में ही छूटे.
रूठ गयी मुरली मुझसे मैया
तिस पर तुम सब भी हो रूठे.

क्यूं भेजा मुझे मथुरा मैया..........

4 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

krishnmay blog ... gokul me aane jaisa laga

रश्मि प्रभा... ने कहा…

krishn to makhan churate the , kuch pal laga aapke saras bhaw chura lun ...

santosh jha ने कहा…

वाह ...
बहुत सुन्दर कविता
मन को भावुक कर दिया

आभार / शुभ कामनाएं

वाणी गीत ने कहा…

इस शिकायत पर माता कैसे संभाल पायी होंगी खुद को ...
भाव झर झर बह रहे हैं , जैसे सामने ही कन्यैया रूठा खड़ा है ...
बहुत सुन्दर !