शनिवार, 12 जून 2010

लीलाधर की लीला

लीलाधर की लीला
समझ पाना बड़ा मुश्किल है.
समझना है उनको गर तो
दे दो उनको ये जो दिल है.

ध्यान से भी समझ न आये
ज्ञान से भी परे हैं वो.
उसको ही वो दरस दिखाते
भक्ति से उनको भजता है जो.

आँसू से जिसने चरण पखारे
विरह वेदना से किया श्रृंगार.
फिर कहाँ रुक पाते पाँव प्रभु के
दौड़े आते हैं वो भक्त के द्वार.

खट्टा - मीठा, कड़वा - नमकीन
व्यंजन से नही है उनको सरोकार.
बस भाव के ही तो भूखे हैं कृष्णा
बस परसों उनको अपना प्यार .

चंचल चितवन,मोहिनी सूरत
अधर पे नाचे वंशी की तान .
मुस्कान उनकी सुन्दर है इतनी
कि बसते उसमे भक्त के प्राण.

पाने को इनका, है सहज तरीका.
छोड़ के सबकुछ,बन जा बस इनका.

आगे की सोच न पीछे की सोच
तेरा सब बोझ अब बोझ है इनका.

घोंसला भी इनकी,बच्चा भी इनका
जोडेंगे ये ही अब घोंसले का तिनका.

3 comments:

सुनीता शानू ने कहा…

आप भी चले आयें ब्लॉगर मीट में नई पुरानी हलचल

वन्दना ने कहा…

बस यही है कान्हा प्रेम्…………बहुत सुन्दर रचना।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत भावमयी रचना ... कृष्ण भक्ति में डूबी हुई रचना