बुधवार, 5 अप्रैल 2017

!! हर हृदय में जन्मे राम लला और जीवन भर हम जन्मोत्सव मनाए !!


चैत महीने के शुक्ल पक्ष में  
नौंवी तिथि की थी वो दोपहर
न सर्दी अधिक,न गर्मी ज़्यादा
वातावरण था स्निग्ध मनोहर।

तीनों लोक कर रहा था प्रतीक्षा
कि आज अजन्मा जन्मेंगे जग में
धरती पे धर्मी कर रहे थे प्रतीक्षा
देवता करे प्रतीक्षा बैठे स्वर्ग में।

दिव्य स्तुति, गान, वादन, नर्तन
सारी सृष्टि समायी थी आनंद में
वेदवाणी से लग रहे पवन के सूर
पक्षी कलरव कर रहे थे छंद में।

तब प्रकट हुए दशरथ भवन में
अजन्मा, अविनाशी प्रभु राम
चतुर्भुज रूप, आयुध से युक्त
आत्माराम प्रभु वो आत्मकाम।

देख प्रभु का ऐश्वर्य और वैभव
माँ ने करी एक विनती प्रभु से
त्याग दें अपना ये चतुर्भुज रूप
बन जाओ शिशु आप विभु से।

देखनी है आपकी शिशुलीला
मुझे तो माँ-सा लाड़ लड़ाना है
पुत्र की भाँति लगाकर हृदय से
मुझे तो आप पर प्रेम लुटाना है।

सुनकर माँ की निश्चल वाणी
बन गए बालक साकेतबिहारी
शिशुलीला की कर शुरुआत
लगे हैं रोने अब सुदर्शनधारी।

भक्त के प्रेम में पड़कर ही तो
प्रभु इस धरा पर आते रहते हैं
पिता पुत्र भाई बंधु सब लीला
भक्त के प्रेम में बंधकर करते हैं।

वरना दुष्टों के संहार के लिए तो
उनका एक संकल्प ही पर्याप्त है
प्रेम में पड़कर ही तो बने बालक
प्रभु  जो कण-कण में व्याप्त है।

जब कौशल्या-सी तड़प ममता की
दशरथ-सा अनन्य प्रेम  हो जाता है
तब प्रेमी भक्त अपने हृदय मंदिर में
राम जन्म का अनुपम सुख पाता है।

हर हृदय में जन्मे राम लला और
जीवन भर हम जन्मोत्सव मनाए
राघव से ही करें हम विनती कि
उनकी कृपा के लायक बन पाए।

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

!! तीनों लोकों के पालनहार, बन गए आज मैया के लाल!!


तीनों लोकों  के पालनहार
जिनकी इच्छा से चले काल
परमपुरुष, परमात्मा,  स्वराट
बन गए आज मैया  के लाल.

श्यामल वर्ण, कमल नयन
रक्तिम अधर सुंदर सुकुमार.
घुंघराले काले बादल से केश
छोटा-सा नन्हा-सा तारणहार.

जब भी प्रकट होते प्रभु तब
सारी सृष्टि मनाती है उत्सव.
उनके प्राकट्य दिवस से बढ़कर
कहाँ कहीं कोई और महोत्सव.

मनाये महोत्सव करे प्रार्थना
हृदय हमारा उनका हो जाए.
मन, वाणी, बुद्धि ,प्राण तक में
बस साँवली सूरत ही छा जाए.

!! जैसे नंदमहल में पधारे हो मोहन पधारो हमारे भी मन के महल में !!


भाद्र मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी
रोहिणी नक्षत्र और मध्य रात्रि
जब काली अँधियारी रात में
फैला था जैसे बनके  उजाला ।

भर गया वो रोशनी कारागृह में
भावनाओं में, आकांक्षाओं में
कर गया प्रदीप्त पूरे भुवन को
देवकी का जना लाल वो काला।

खुल गयी बेड़ियाँ,खुल गये द्वार
खुल गए जगत के सारे बंधन
आने की आहट सुनते ही जिनकी
निद्रा में सो गया पाप का रखवाला।

बरस-बरसकर  करे मेघ  अभिषेक
यमुना चरणों को बार-बार पखारे
यमुना को पारकर,गोकुल पधार कर
देवकीसुत अब बन गये हैं नंदलाला।

नंदमहल में उल्लास-ही-उल्लास है
हर ओर माखन-मिस्री सी मिठास है
कोई नही कहता कि हुआ है लाला
नंद के आनंद भयो कहे ब्रिजवाला।

जैसे नंदमहल में पधारे हो मोहन
पधारो हमारे भी मन के महल में।
दुनिया के साज औ राग बहुत हुए
अब तो मुरली सुना दे मुरलीवाला।

सोमवार, 13 जून 2016

!! हो शांति, संतुष्टि और चैन भरा प्रस्थान !!


जीवन में जो हैं
घड़ियाँ मिली.
बीती जा रही है
घड़ी दर  घड़ी.

अभी भी सुधि नही
है सुधरने की.
अभी भी ख्वाहिशें
जस-की-तस हैं पड़ी.

रोज ही
ढलता सूरज
चुरा ले कुछ
जीवन मुझसे.

घटते जा रहे हैं
मेरे दिन
बिना बताये
बिना ही पूछे.

ये बहती हवा
देती हैं साँसें
पर हर साँस की
होती है गिनती.

एक भी साँस
ज्यादा न मिले
कितनी भी कर ले
हम चाहे विनती.

जीवन के दीये में
तेल है जितना.
उतनी ही देर तो
ये जल पायेगा.

किसी दिन
फफककर
दिल खोलके जलकर
ये बुझ जाएगा.

उस दिन फिर
कौन संग जाए?
कौन करे कम पीड़ा
कौन हरे दुःख हमारा?

ये जमा कमाया
शोहरत-दौलत.
दूर के रिश्ते या
पास का बेटा दुलारा?

जाने की पीड़ा
होगी मन में
या कुछ देकर
जाने का संतोष?

जीवन को
करेंगे शुक्रिया
या लगाते रहेंगे
तब भी दोष?

आज जरा मैं
सोचूँ उसपे.
मेरा अपना अस्तित्व
टिका है जिसपे.

हो शांति
संतुष्टि
और चैन
भरा प्रस्थान.

कोई ग्लानि,
कोई गलती
न बने
मार्ग का व्यवधान.